जीवनी और महिला लेखनः छूटे पन्नो की उड़ान – एक समीक्षा

Authors

  • डॉ. मीना एम. राठोड
  • प्रा. रमेशभाई बनकर

DOI:

https://doi.org/10.47413/vidya.v2i2.198

Abstract

दलित साहित्य मनुष्य को मनुष्य के रुप में देखता है। जिसे हम दलित मनोवैज्ञानिक मुक्ति का साहित्य कहते है। हशिये के बहार पडा भारतीय दलित समाज आज आत्मसम्मान तथा बहिस्कृत जिंदगी से मुक्ति पाने का संघर्ष एवं अपने आत्मसम्मान की पहचान की लडाई लड़ रहा है। शोषण के प्रति विद्रोह भाव जगाना ही साहित्य कर्मियों का कर्तव्य है। दलित साहित्य का उद्देश्य दलित समाज में जागृति पैदा करके उनमें स्वाभिमान भरना है। वे चाहते है कि संपूर्ण समाज व्यवस्था को नष्ट करके समान समाज व्यवस्था का निर्माण हो, नवीन समाज व्यवस्था निर्मित हो वहाँ हरेक व्यक्ति को समान अधिकार मिले।

References

(1) छूटे पन्नो की उड़ान __ अनीता भारती

स्वराज प्रकाशन , नई दिल्ली –110002,

प्रथम संस्करण 2018

(2) दलित अल्पसंख्यक __ संपादक संतोष भारती

सशक्तिकरण राजकमल प्रकाशन प्रा.लि. नई दिल्ली – 110002

पहला संस्करण 2008

(3) हिन्दी आत्मकथा __ डॉ. सविता सिंह

स्वरूप विवेचन और विकासक्रम __ शैलजा प्रकाशन,कानपुरी-208011

संशोधित संस्करण 2015

(4) हिन्दी कथा साहित्य में __ डॉ. पंडीत बन्ने

दलित विमर्श शक्ति प्रकाशन,अहमदाबाद - 380013

संस्करण 2012

(5) हिन्दी लिखिकाओ की __ डॉ. सरजूप्रसाद मिश्र

आत्मकथाए अमन प्रकाशन,कानपुरी - 205012

द्वितीय संस्करण 2015

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Published

17-07-2023

Issue

Section

Articles

How to Cite

जीवनी और महिला लेखनः छूटे पन्नो की उड़ान – एक समीक्षा. (2023). VIDYA - A JOURNAL OF GUJARAT UNIVERSITY, 2(2), 6-9. https://doi.org/10.47413/vidya.v2i2.198